Monday, 14 March 2016

बावरे हिंदी मुहावरे

हिंदी के मुहावरे,बड़े ही बावरे है,
खाने पीने की चीजों से भरे है ।
कहीं पर फल है तो कहीं आटा दालें  है ,
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले है ।
फलों की ही बात ले लो....
आम के आम, गुठलियों के भी दाम मिलते है,
कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे,
खरबूजे को देख कर रंग बदलते है।
कहीं दाल में काला है,
कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है,
कहीं किसी की दाल नहीं गलती,
कोई लोहे के चने चबाता है,
कोई घर बैठा रोटियाँ तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है, मुफलिसी में जब आटा गीला होता है ,
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है।
सफलता के लिए बेलने पड़ते है कई पापड़,
कभी कभी सीधी उँगलीसे घी नहीं निकलता तो टेढी उँगलीसे भी निकालना पड़ता है।
आटे में नमक तो जाता है चल, पर गेहूँ के साथ, घुन भी पिस जाता है ।
अपना हाल तो बेहाल है, ये मूँग और मसूर की दाल है,
गुड खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं,
और गुड़ का गोबर कर बैठते हैं।
कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड बनता है,
कभी ऊँट के मुंह में जीरा है ।
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है।
किसी के दाँत दूध के हैं ,
किसी को छटी का दूध याद आ जाता है ,
दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक पीता है ,
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है ।
शादी बूरे के लड्डू हैं , जिसने खाए वो भी पछताए,
और जिसने नहीं खाए, वो भी पछताते हैं ।
पर शादी की बात सुन, मन में लड्डू फूटते है ,
और शादी के बाद, दोनों हाथों में लड्डू आते हैं ।
कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है,
किसी के मुंह में घी शक्कर है, सबकी अपनी अपनी तकदीर है।
कभी कोई चाय पानी करवाता है,
कोई मख्खन लगाता है।
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है ,
तो सभी के मुंह में पानी आता है ।
भाई साहब अब कुछ भी हो ,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है।
जितने मुँह है, उतनी बातें हैं,
सब अपनी अपनी बीन बजाते है।
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ,
सभी बहरे है, बावरें है
ये सब हिंदी के मुहावरें हैं ।

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